उर्दू परिषद की सावरकर पर किताब : इतिहासकारों ने उठाए सवाल 

नेशनल काउन्सल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज (उर्दू परिषद) की सावरकर पर पुस्तक का उर्दू अनुवाद प्रकाशित करने को लेकर इतिहासकारों ने सवाल उठाए हैं और नरेंद्र मोदी सरकार पर अपने प्रशासनिक नियंत्रण वाली संस्थाओं का दुरुपयोग विवादास्पद हिंदू हस्तियों के महिममंडन अथवा उनका बचाव करने के लिए करने का आरोप लगाया है। 

शिक्षा मंत्रालय के अधीन कार्य करने वाली उर्दू परिषद ने हाल में आई किताब वीर सावरकर : द मैन हू कुड हैव प्रीवेन्टेड पार्टिशन का उर्दू अनुवाद वीर सावरकर और तकसीम-ए-हिन्द का अलमिया प्रकाशित किया है। किताब में हिंदू महासभा नेता वी डी सावरकर की हिन्दुत्व विचारधारा का बचाव किया गया है। कुछ इतिहासकारों और उर्दू परिषद के पूर्व अधिकारियों का कहना है कि सावरकर को लेकर गढ़ा जा रहा नया नैरेटिव ऐतिहासिक प्रमाणों के उलट है।

पिछले गुरुवार को पुस्तक के उर्दू संस्करण का विमोचन प्राइम मिनिस्टर म्यूज़ीअम में हुआ। एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार अर्जुन मेघवाल ने कहा कि सावरकर राष्ट्रीय एकता व अखंडता को लेकर बहुत संवेदनशील थे और इसलिए भारत के विभाजन के कड़े विरोधी थे। यदि उनके विचार और योजना पर अमल होता तो देश को टूटने से बचाया जा सकता था। 

मूल पुस्तक 2021 में प्रकाशित की गई थी और इसके लेखक उदय महूरकर और चिरायु पंडित हैं। उर्दू अनुवाद जामिया मिलिया इस्लामिया के कुलपति प्रोफेसर मज़हर आसिफ ने किया है। 

विज्ञप्ति के अनुसार महूरकर ने कार्यक्रम में कहा कि किताब सावरकर के बारे में “सच्ची और निष्पक्ष जानकारी” देती है। उन्होंने यह भी दावा किया कि पुस्तक “एक खास विचारधारा द्वारा फैलाई गलत धारणाओं” का खंडन करती है। 

महूरकर ने कहा कि किताब में सावरकर के “मुस्लिमों के बारे में वास्तविक विचारों” को सामने लाती है। और दिखाती है कि वह सभी क्रांतिकारियों और स्वतंत्र सेनानियों का सम्मान करते थे जिन्होंने राष्ट्रीय संघर्ष में हिस्सा लिया था और वह मुस्लिमों समेट सभी सामाजिक वर्गों की भागीदारी को देश के सर्वांगीण विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानते थे। 

इंडियन हिस्ट्री काँग्रेस के सचिव और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में इतिहास पढ़ाने वाले प्रोफेसर नदीम रिजवी ने कहा कि सावरकर ने द्विराष्ट्र सिद्धांत का अनुमोदन मुस्लिम लीग के 1940 में इसे अपनाने से पहले दिया था। उन्होंने कहा, “यह इसलिए भी स्तब्ध करने वाला है कि कइयों के अनुसार सावरकर के द्विराष्ट्र सिद्धांत को बढ़ावा देने और मुस्लिम विरोधी सोच ने विभाजन को अपरिहार्य बनाने वाले माहौल तैयार करने में योगदान दिया। 1937 में हिंदू महासभा में भाषण में सावरकर ने कहा, “देश में दो राष्ट्र हैं हिंदू और मुस्लिम।”  रिजवी के अनुसार ऐसे कथनों ने सांप्रदायिक तनाव को जन्म दिया और अलग धार्मिक राष्ट्रीयता के विचार को वैधता दी।

रिजवी ने कहा कि भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सावरकर के नेतृत्व में हिंदू महासभा ने सिंध और बंगाल में मुस्लिम लीग के साथ मिलकर गठबंधन सरकारें बनाईं। 1947 में सावरकर ने त्रावणकोर दीवान सीपी रामासामी की भारत से स्वयंत्र होने की घोषणा का समर्थन किया क्योंकि इसमें उन्हें धर्मनिरपेक्ष भारतीय राष्ट्र का संभावित प्रतिकार दिखा। 

रिजवी ने कहा, “सावरकर के ऐसे विचार न होते तो शायद विभाजन को टाला जा सकता था।” उन्होंने सवाल किया कि क्या सावरकर भारत के साथ मुस्लिमों के बेमेल होने की बात नहीं करते थे? उन्हें समान विभाजन के बजाय हिंदू प्रभुत्व अथवा प्राधान्य चाहिए था। 

उर्दू परिषद के एक पूर्व अधिकारी ने कहा कि परिषद ने इससे पहले कभी विवादास्पद राजनीतिक शख्सियतों पर कोई पुस्तक प्रकाशित नहीं की है। उन्होंने कहा, “यह परिषद का काम ही नहीं है। परिषद का काम है भाषा के संवर्धन के लिए उर्दू में आनंदप्रद साहित्य प्रकाशित करे।” 

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